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रस किसे कहते हैं, रस के प्रकार और इसके अंग | Ras kya hai- ras ke prakar aur iske ang

किसी काव्य पंक्ति को पढ़कर मन में भाव जाग्रत होते हैं एवं अलौकिक आनंद की अनुभूति होती है। ये मन के भाव ही रस कहलाते हैं। "वाक्यं रसात्मकं वाक्यं" अर्थात् रस युक्त वाक्य ही काव्य है। रस को काव्य की आत्मा कहा जाता है। किसी कार्य या साहित्य को पढ़ने, सुनने या देखने से पाठक, श्रोता या दर्शक को जिस आनंद की अनुभूति होती है, उसे रस कहते हैं।
भरतमुनि के अनुसार, "विभावानुभाव व्यभिचारि संयोगाद्रस निष्पत्तिः" अतः जब स्थायी भाव का संयोग विभाव, अनुभव और व्यभिचारी (संचारी) भाव से होता है, तब रस की निष्पत्ति होती है।

इसके चार अंग होते हैं-
1. स्थायी भाव
2. विभाव
3. अनुभव
4. संचारी भाव (व्यभिचारी भाव)

स्थायी भाव- सहृदय के हृदय में जो भावी स्थायी रूप से विद्यमान रहते हैं, स्थायी भाव कहलाते हैं। इन्हें अनुकूल या प्रतिकूल किसी प्रकार के भाव दबा नहीं पाते। प्रत्येक रस का एक स्थायी भाव होता है। इनकी संख्या 10 है। रति, हास, शोक, उत्साह, क्रोध, भय, जुगुप्सा (घृणा), विस्मय, शम (निर्वेद), वत्सल स्थायी भाव हैं।

संचारी भाव- आश्रय के चित्त में उत्पन्न होने वाले अस्थिर मनोविकारों को संचारी भाव कहते हैं। इसे व्यभिचारी भाव भी कहते हैं। ये स्थायी भावों को पुष्ट करने में सहायक होते हैं। इनकी स्थिति पानी के बुलबुले के समान उत्पन्न होने और समाप्त होते रहने की होती है। इनकी संख्या 33 है। प्रमुख संचारी भाव- दैन्य, मद, जड़ता विषाद, निद्रा, मोह, उग्रता, शंका, चपलता, निर्वेद, ग्लानि, हर्ष, आवेग, स्मृति, आलस्य, चिंता, दीनता आदि।

हिन्दी व्याकरण के इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।।
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7. अंग्रेजी वर्णमाला की सूक्ष्म जानकारी

स्थायी भाव एवं संचारी भाव में अंतर निम्नलिखित है-
1. स्थायी भाव हृदय में सदैव विद्यमान रहते हैं, जबकि संचारी भाव पानी के बुलबुले के समान कुछ समय हृदय में रहते हैं और फिर लुप्त हो जाते हैं।
2. स्थायी भावों की संख्या 10 है, जबकि संचारी भावों की संख्या 33 है।
3. प्रत्येक रस का स्थायी भाव होता है, जबकि कुछ स्थानों पर संचारी भाव नहीं होते।
4. स्थायी भाव संचारी भाव को पुष्ट नहीं करते, जबकि संचारी भाव स्थायी भाव को पुष्ट करते हैं।

अनुभाव- आश्रय की बाह्य शारीरिक चेष्टाओं को अनुभव कहते हैं। अनुभव चार प्रकार के होते हैं- कायिक, मानसिक, आहार्य, सात्विक

विभाव- स्थायी भावों के उत्पन्न होने के कारणों को विभाव कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं- आलंबन और उद्दीपन।
1. आलंबन- स्थायी भाव जिन व्यक्तियों, वस्तुओं आदि का आलंबन लेकर अपने को प्रकट करते हैं, उन्हें आलंबन कहते हैं।
जिसके प्रति स्थायी भाव उत्पन्न हो, वह आलंबन कहलाता है। आलंबन के भेद-
आश्रय- जिस व्यक्ति के मन में भाव जाग्रत हो, वह आश्रय कहलाता है।
विषय- जिसको देखकर मन में भाव जागृत हो, वह विषय कहलाता है।
2. उद्दीपन- भावों को बढ़ाने या उद्दीप्त करने वाली वस्तुओं या चेष्टाओं को उद्दीपन कहते हैं।

हिन्दी व्याकरण के इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।।
1. लिपियों की जानकारी
2. शब्द क्या है

रस के भेद- रस दश प्रकार के होते हैं। रस एवं उनके स्थायी भाव निम्नलिखित हैं-
1. श्रृंगार रस- रति
2. हास्य रस- हास
3. करुण रस- शोक
4. रौद्र रस- क्रोध
5. वीर रस- उत्साह
6. भयानक रस- भय
7. वीभत्स रस- जुगुप्सा (घृणा)
8. अद्भुत रस- विस्मय
9. शांत रस- पश्चताप/शम (निर्वेद)
10. वात्सल्य रस- वत्सल

श्रंगार रस- नायक, नायिका के सौंदर्य तथा प्रेम संबंधी परिपक्व अवस्था को श्रृंगार रस कहते हैं। श्रृंगार रस का स्थायी भाव 'रति' है।
सहृदय के हृदय में विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से पुष्ट रति स्थायी भाव जब अपनी परिपक्वता को प्राप्त कर लेता है तब श्रृंगार रस की उत्पत्ति होती है। इसे 'रसराज' भी कहा जाता है।
श्रंगार रस के दो भेद हैं-
1. संयोग श्रृंगार रस
2. वियोग श्रृंगार रस

संयोग श्रृंगार रस- जहाँ नायक और नायिका के संयोग की स्थिति का वर्णन होता है, वहाँ संयोग श्रृंगार रस होता है।

उदाहरण-
1. दुलह श्री रघुनाथ बने, दुलही सिय सुंदर मंदिर माही।
गावति गीत सखै मिलि सुंदरी, बेद गुवा जुरि विप्र पढ़ाही।
राम को रूप निहारति जानकी, कंकन के नग की परछाही।
यतै सबै सुधि भूलि गई, कर टेकी रही पल टारत नाहीं।
प्रस्तुत उदाहरण में-
स्थायी भाव- रति
विभाव- आलंबन- आश्रय- जानकी, विषय- श्री राम
उद्दीपन- कंगन के नग में प्रिय का प्रतिबिंब
अनुभाव- कर टेकना, पलक न गिरना
संचारी भाव- हर्ष, जड़ता, उन्माद

2. बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय।
सौंह करें, भौहनि हँसें, देन कहे नेट जाय।

हिन्दी व्याकरण के इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।।
1. शब्द क्या है- तत्सम एवं तद्भव शब्द
2. देशज, विदेशी एवं संकर शब्द
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8. पर्यायवाची शब्द सूक्ष्म अन्तर एवं सूची

वियोग श्रृंगार रस- जिस रचना में नायक और नायिका का विरह वर्णन हो, वहाँ वियोग श्रृंगार रस होता है।

उदाहरण-
1. आँखों में प्रियमूर्ति थी, भूले थे सब भोग।
हुआ योग से भी अधिक, उसका विषम वियोग।

2. अँखियाँ हरि दरसन की भूखी।
कैसे रहें रूप रस राँची ए बतियाँ सुनि रूखीं।

हास्य रस- जहाँ किसी व्यक्ति की वेशभूषा, आकृति तथा विकृत वाणी को देखकर या सुनकर हँसी उत्पन्न होती है वहाँ हास्य रस होता है। हास्य रस का स्थायी भाव 'हास' है।
सहृदय के हृदय में स्थित हास्य नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से संयोग होता है तब हास्य रस की निष्पत्ति होती है।

उदाहरण-
1. जब धूम धाम से जाती है बारात किसी की सजधज कर।
मन करता धक्का दे दूल्हे को, जा बैठूँ घोड़े पर।
सपने में ही मुझको अपनी, शादी होती दिखती है।
वरमाला ले दुल्हन बढ़ती, बस नींद तभी खुल जाती है।

2. मैं महावीर हूँ पापड़ को तोड़ सकता हूँ।
गुस्सा आ जाए तो, कागज को मरोड़ सकता हूँ।

3. सिर घोट मोट, पर चुटिया थी लहराती।
थी तोंद लटक कर, घुटनों को छू जाती।
जब मटक-मटक कर चले, हँसी भी भारी।
हो गए देखकर लोट-पोट नर-नारी।

हिन्दी व्याकरण के इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।।
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करुण रस- किसी प्रिय व्यक्ति या वस्तु के अनिष्ट या विनाश होने से जो हमारे मन में विकलता आती है, वहाँ करुण रस होता है। करुण रस का स्थायी भाव 'शोक' है।
सहृदय के हृदय में स्थित शोक नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभव और संचारी भाव से संयोग होता है, तब करुण रस की निष्पत्ति होती है।

उदाहरण-
1. कौरवों के श्राद्ध करने के लिए, याकि रोने को चिता के सामने।
शेष अब है रह गया कोई नहीं, एक वृद्धा एक अंधे के सिवा।

2. अभी तो मुकुट बँधा था माथ
हुए कल ही हल्दी के हाथ
खुले भी न थे लाज के बोल
खिले भी न चुंबन शून्य कपोल
हाय! रुक गया यही संसार
बना सिंदूर अनल अंगार

3. हा राम! हा प्राण प्यारे! जीवित रहूँ किसके सहारे?

रौद्र रस- ऐसी काव्य पंक्तियाँ जिन्हें पढ़ने या सुनने से आप में क्रोध या रौद्र का भाव जागे, वहाँ रौद्र रस होता है। जब काव्य में क्रोध भाव का वर्णन हो तब रौद्र रस की निष्पत्ति होती है। रौद्र रस का स्थायी भाव 'क्रोध' है।
सहृदय के हृदय में स्थित क्रोध नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभव और संचारी भाव से संयोग हो जाता है तब वहाँ रौद्र रस की निष्पत्ति होती है।

उदाहरण-
1. अति रिस बोले बचन कठोरा।
कहु जड़ जनक धनुष केहि तोरा।।
बेगि देखाव मूढ़ नतु आजू।
उलटौ महि जहँ लगि तव राजू ।।

2. श्री कृष्ण के सुन वचन, अर्जुन क्रोध से जलने लगे।
सब शोक अपने भूलकर, करतल युगल मलने लगे।
संसार देखे अब हमारे, शत्रु रण में मृत पड़े।
करते हुए यह घोषणा, वे हो गए उठकर खड़े।

इन प्रकरणों 👇 के बारे में भी जानें।
1. मित्र को पत्र कैसे लिखें?
2. परिचय का पत्र लेखन
3. पिता को पत्र कैसे लिखें?
4. माताजी को पत्र कैसे लिखें? पत्र का प्रारूप
5. प्रधानपाठक को छुट्टी के लिए आवेदन पत्र

वीर रस- ओजस्वी वीर घोषणाएँ या वीर गीत सुनकर तथा उत्साह वर्धक कार्यकलापों को देखने से यह रस जाग्रत होता है। वीर रस का स्थाई भाव 'उत्साह' है।
सहृदय के हृदय में स्थित उत्साह नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से संयोग हो जाता है तब वीर रस की निष्पत्ति होती है।

उदाहरण-
1. थर्राती है वसुधा सारी, है आसमान तड़ातड़ा रहा।
अरि दल पर कूद पड़ूँ उड़कर, है रोम रोम फड़फड़ा रहा।

2. हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती।
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती।
अराति सैन्य-सिन्धु में सुवाडवाग्नि से जलो।
प्रवीर हो जयी बनो, बढ़े चलो बढ़े चलो।

वीर एवं करूण रस में अंतर निम्नलिखित है-
1. ओजस्वी वीर घोषणाओं एवं वीर गीत सुनने पर वीर रस जाग्रत होता है, जबकि किसी प्रिय व्यक्ति या वस्तु के विनाश या अनिष्ट होने पर करुण रस जाग्रत होता है।
2. वीर रस की निष्पत्ति पर चित्त में उत्साह वर्धन होता है, जबकि करूण रस की निष्पत्ति होने पर चित्त में विकलता आती है।
3. वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है, जबकि करुण रस का स्थायी भाव शोक है।
4. वीर रस महाकाव्य का प्रधान रस है, जबकि करुण रस खंडकाव्य का प्रधान रस है।

भयानक रस- भयंकर प्राकृतिक दृश्यों को देखकर अथवा प्राणों के विनाशक बलवान शत्रु को देखकर अथवा उसका वर्णन सुनकर भय उत्पन्न होता है, वहाँ भयानक रस होता है। भयानक रस का स्थायी भाव 'भय' है।
सहृदय के हृदय में स्थित भय नामक स्थायी भाव का जब अनुभाव, विभाव और संचारी भाव से संयोग हो जाता है तब भयानक रस की निष्पत्ति होती है।

उदाहरण-
1. हाहाकार हुआ क्रंदनमय, कठिन वज्र होते थे चूर।
हुए दिगंत बधिर भीषण रण, बार-बार होता था क्रूर।

2. काली के खप्पर में
खून दान करते हुए
कँहर पैर धरते हुए
शूर लाश ढोते जहाँ
काश तुम होते वहाँ
स्यार आदि खाते हैं
ऐसे प्रान जाते हैं
दिवा और रात्रि जहाँ
काश तुम होते वहाँ।

वीभत्स रस- जहाँ दुर्गंधयुक्त वस्तुओं, चर्बी, रुधिर आदि का ऐसा वर्णन हो जिससे मन में घृणा उत्पन्न हो वहाँ विभत्स रस होता है। विभत्स रस का स्थायी भाव 'जुगुप्सा (घृणा)' है।
सहृदय के हृदय में स्थित जुगुप्सा (घृणा) नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभव और संचारी भाव से संयोग हो जाता है तब विभत्स रस की निष्पत्ति होती है।

उदाहरण-
1. अटपटी उलझी लताएँ।
डालियों को खींच लाएँ
पैर को पकड़े अचानक
प्राण को कस ले, कंपाएँ
साँप की काली लताएँ

2. देखी तुमरी कासी, लोगों देखी तुमरी कासी
जहाँ विराजै विश्वनाथ विशेश्वर जी अविनासी।
आधी कासी भाट भडेरिया ब्राह्मन और संन्यासी।
आधी कासी रंडी मुण्डी राख खानगी खासी।

3. सिर पै बैठो काक, आँखि दोऊ खात निकारत।
खींचत जीभहिं स्यार अतिहि, आनंद उर धारत।

अद्भुत रस- जहाँ अलौकिक व आश्चर्य जनक वस्तुओं या घटनाओं को देखकर या सुनकर जो विस्मय (आश्चर्य) भाव हृदय में उत्पन्न होता है, वहाँ अद्भुत रस पाया जाता है। अद्भुत रस का स्थायी भाव 'विस्मय (आश्चर्य)' है।
सहृदय के हृदय में स्थित विस्मय नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से संयोग होता है तब अद्भुत रस की निष्पत्ति होती है।

उदाहरण-
1. बिनु पद चलै सुनै बिनु काना, कर बिनु कर्म करै विधि नाना।
आनन रहित सकल रस भौगी, बिन वाणी वक्ता बड़ जोगी।

2. देख समस्त विश्व-सेतु से मुख में,
यशोदा विस्मय सिंधु में डूबी।

3. इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा।
मति भ्रम मोर की आन-विसेखा।

इन प्रकरणों 👇 के बारे में भी जानें।
1. प्राथमिक शाला के विद्यार्थियों हेतु 'गाय' का निबंध लेखन
2. निबंध- मेरी पाठशाला

शांत रस- संसार की असारता का अनुभव होने पर हृदय में तत्वज्ञान या वैराग्य भावना के जाग्रत होने पर शांत रस निष्पन्न होता है। इसका स्थायी भाव 'निर्वेद' है।
सहृदय के हृदय में स्थित निर्वेद (पश्चताप) नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से संयोग होता है, तब शांत रस की निष्पत्ति होती है।

उदाहरण-
1. चलती चाकी देखकर, दिया कबीरा रोय।
दुइ पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय।

2. समरथ थे जड़ या चेतन, सुंदर साकार बना था।
चेतनता एक विलसती, आनंद अखंड घना था।

वात्सल्य रस- जहाँ बच्चों की आनंदमयी क्रीडाओं एवं बातों का वर्णन हो, वहाँ वात्सल्य रस होता है।
जिन पंक्तियों को पढ़कर मन में ममता के भाव, वात्सल्य के भाव आएँ वहाँ वात्सल्य रस होता है।
कविता में जहाँ माता-पिता और पुत्र के बीच के क्रिया-कलापों में प्रेम (स्नेह) भाव का वर्णन हो, वहाँ वात्सल्य रस होता है। इसका स्थायी भाव 'वत्सल (पुत्र प्रेम)' है। इसी तरह गुरु-शिष्य का प्रेम भी वात्सल्य रस के अंतर्गत आता है।
सहृदय के हृदय में स्थित वत्सल नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभव और संचारी भाव से संयोग होता है, तब वात्सल्य रस की रस की निष्पत्ति होती है।

उदाहरण-
1. धूरि भरे अति शोभित श्यामजू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनी बाजति पीरी कछोटी।
वा छवि को रसखानि बिलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सौं ले गयो माखन रोटी।

2. मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी।
किनी बार मोहि दूध पिअत भई,
यह अजहूँ है छोटी।।
तू जो कहती बल की बेनी ज्यौं,
ह्वै है लाँबी मोटी।
काढ़क गुहत न्हवावत ओछत,
नागिनि-सी भुइँ लोटी।

इन प्रकरणों 👇 को भी पढ़ें।
1. हिंदी गद्य साहित्य की विधाएँ
2. हिंदी गद्य साहित्य की गौण (लघु) विधाएँ
3. हिन्दी साहित्य का इतिहास चार काल
4. काव्य के प्रकार
5. कवि परिचय हिन्दी साहित्य
6. हिन्दी के लेखकोंका परिचय

आशा है, 'रस' से संबंधित यह जानकारी परीक्षापयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।
धन्यवाद।
RF Temre
infosrf.com

I hope the above information will be useful and important.
(आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।)
Thank you.
R F Temre
infosrf.com


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(संबंधित जानकारी नीचे देखें।)



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    Annu khatik

    Posted on September 06, 2021 03:09AM

    9516129841

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