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हिन्दी की क्रियाओं के अन्त में 'ना' क्यों जुड़ा होता है? मूल धातु एवं यौगिक धातु || Why is 'na' attached to the end of Hindi verbs?


हिन्दी की क्रियाओं के अन्त में 'ना' क्यों जुड़ा होता है? मूल धातु एवं यौगिक धातु || Why is 'na' attached to the end of Hindi verbs?

उप शीर्षक:
धातु किसे कहते हैं, हिन्दी की क्रियाओं के अन्त में 'ना' क्यों जुड़ा होता है, मूल धातु एवं यौगिक धातु क्या है?

हिन्दी भाषा की क्रियाओं के अंत में 'ना' जुड़ा होता है जैसे- लिखना, पढ़ना, खाना, आना, जाना, कूदना, डाँटना, फेंकना, पकाना आदि। इन सभी क्रियाओं में आप देखते हैं कि सभी के अंत में 'ना' जुड़ा हुआ है। आखिर यह 'ना' क्यों जुड़ा होता है? इसे समझने के लिए आइए 'धातु' के बारे में जानते हैं।

'क्रिया' की उत्पत्ति 'धातु' से होती है अर्थात जिस मूल शब्द से क्रिया बनती है उसे 'धातु' कहते हैं। क्रिया का निर्माण धातु में 'ना' जोड़ने से होता है और क्रिया से 'ना' हटा देने पर जो शेष बच जाता है उसे ही 'धातु' कहते हैं।

उदाहरण के लिए 'लिखना' क्रिया में 'ना' हटा देने पर 'लिख' शेष रह जाता है और यही धातु है।
यदि हम धातु के प्रकारों की बात करें तो धातु दो प्रकार की होगी (i) मूल धातु (ii) यौगिक धातु
(i) मूल धातु - क्रिया के मूल रूप को 'मूल धातु' कहा जाता है। यह किसी पर आधारित न होकर स्वतन्त्र होती है। जैसे लिख, पढ़, आ, जा, उड़, पका, चल, उठ आदि।

(ii) यौगिक धातु - ऐसी धातु जो दो या उससे अधिक धातुओं या अन्य प्रत्ययों के संयोग से युक्त होकर बनती है, यौगिक धातु कहलाती है। जैसे- लिखना, लिखे, जायेगी, पढ़ती, जाये, आयी, खेलना, पकाई, लिखवाना आदि।

यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है कि जिन धातु रूपों में 'ना' लगा होता है वह मूल क्रियाएँ कहलाती है और इन्हीं रूपों को क्रिया के रूप में जाना जाता है। इस 'ना' लगे क्रिया रुप को ही 'सामान्य धातु' या 'सरल धातु' भी कहा जाता है। मूल धातु में भिन्न-भिन्न प्रत्ययों को जोड़कर उनसे व्युत्पन्न रूपों का प्रयोग क्रियापद के रूप में वाक्य में किया जाता है।

जैसे नीचे 'लिखना' क्रिया की बात की गई है। इसके निम्नलिखित व्युत्पन्न रुप होंगे-
लिख, लिखूँ, लिखा, लिखे, लिखी, लिखो, लिखिए, लिखता, लिखती, लिखते, लिखूँगा, लिखूँगी, लिखेंगे, लिखेगा, लिखेगी, लिखाता, लिखाते, लिखाती, लिखाया, लिखवाया, लिखवाये, लिखवाई, लिखवायेंगे आदि।

इन सभी के अंत में कोई न कोई प्रत्यय को जुड़ने से रूप परिवर्तित हुए हैं। जैसे- लिखता में 'ता' प्रत्यय है। जब क्रिया का प्रयोग वाक्य में होता है तो वाक्य के कर्ता के वचन और लिंङ्ग के अनुसार क्रियाओं में परिवर्तन होते हैं।
उदाहरण - (i) मोहन तू पत्र लिख।
(ii) मोहन पत्र लिखता है।
(iii) विद्यार्थी निबंध लिखते हैं।
(iv) गीता गीत लिखती है।
(v) दादाजी ने पत्र लिखवाया।

उपरोक्त वाक्यों में हम देखते हैं कर्ता के वचन और लिङ्ग के अनुसार क्रिया में परिवर्तन हुआ है। इसी के साथ हम देखते हैं अलग-अलग कालों में क्रियाओं के रूप भी अलग अलग हो जाते हैं जैसे-
(i) राम फलों के नाम लिखता है।
(ii) मैंने कविताएँ लिखा।
(iii) विद्यार्थी दीपावली का निबंध लिखेंगे।

इस तरह हम देखते हैं क्रिया शब्द 'विकारी' है और क्रिया शब्द में अन्य शब्दांश जुड़कर रूप परिवर्तित होते रहते हैं।
यदि हम क्रिया से संबंधित दूसरे पहलू पर नजर डालें तो हिन्दी में क्रिया शब्द की जानकारी देने के लिए एक ऐसे रूप की आवश्यकता होती है जिसको क्रिया शब्द के रूप में प्रकट किया जा सके। उपरोक्त उदाहरणों में हमने देखा 'लिखना' क्रिया के विभिन्न रूप हैं। अब इनमें से किस रूप को क्रिया शब्द के रुप में प्रकट किया जाये असमंजस की स्थिति बन सकती है।

हम उपरोक्त क्रिया रूपों में देखते हैं कि 'लिख' मूल धातु में प्रत्यय (शब्दांश) जुड़कर नये रूप बनते जाते हैं। प्रत्येक मूल धातु में 'ना' जोड़कर उसे सामान्य (सरल) क्रिया शब्द के रूप में प्रकट किया गया है। अतः अंत में 'ना' प्रत्यय जुड़े हुए धातु रूप को क्रियाशब्द के रूप में प्रकट किया जाता है ताकि क्रिया किसे कहते हैं यह जाना जा सके।

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आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।
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