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प्रौढावस्था एवं वृद्धावस्था काल || Adulthood and Old age Stage || Child Development and Pedagogy


प्रौढावस्था एवं वृद्धावस्था काल || Adulthood and Old age Stage || Child Development and Pedagogy

Child Development and Pedagogy के अन्तर्गत प्रौढ़ावस्था एवं वृद्धावस्था काल (Aulthood and Old age Stage) का वर्णन भी आवश्यक है।

बाल विकास के अध्ययन की दृष्टि से प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था का उतना महत्व नहीं है। यहाँ संक्षेप में इन दोनों अवस्थाओं के बारे में जानकारी दी गई है।

प्रौढावस्था (Adulthood Stage)

प्रौढ़ावस्था को व्यावहारिक जीवन की अवस्था कहा जाता है। इस अवस्था में पारीवारिक जीवन या गृहस्थ जीवन की गतिविधियाँ होती हैं। जिसमें कल्पनाएँ नहीं रह जाती वरन् वास्तविक जीवन की अन्तः क्रियाएँ होती हैं। व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है। उसकी बहुत प्रकार की प्रतिभाएँ उभरकर सामने आती हैं। व्यक्ति अपने विशिष्ट क्षेत्र में कौशल दिखाता है।इस अवस्था में उसे अनेकों प्रकार के संघर्ष तथा समस्याओं का सामना करना पड़ता है। प्रौढ़ को तरह-तरह के उत्तरदायित्वों का निर्वाह भी करना पड़ता है। यह अवस्था सामाजिक तथा व्यावसायिक क्षेत्र के विकास की उत्कृष्ट अवस्था होती है। मानव का सबसे अधिक विकास इसी अवस्था में होता है।

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वृद्धावस्था (Old age Stage)

यह अवस्था बाल्यावस्था की तरह अत्यधिक संवेदनशील (Sensitive) मानी जाती है। उत्तरदायित्व समाप्त होने के बाद व्यक्ति इस अवस्था में आध्यात्मिक चिन्तन की ओर झुकता है। शारीरिक क्षमताएंँ कम होने लगती हैं। स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है। निर्णय लेने की क्षमता में कमी हो जाती है। वृद्धावस्था में समायोजन का अभाव पाया जाता है क्योंकि नई पीढ़ी के साथ उसके मूल्यों का टकराव भी होता है। कभी-कभी बुजुर्गों को असहाय एवं उपेक्षित भी अहसास होता है।वृद्धावस्था में तरह-तरह के शारीरिक मानसिक परिवर्तन होते हैं, बिमारियाँ भी इस अवस्था में अधिक होती हैं। उच्च तनाव, उच्च रक्तचाप, ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों की क्षमता तथा शक्ति की कमी के लक्षण दिखाई देते हैं। सचमुच वृद्ध को उचित देखभाल के साथ-साथ सहानुभूति की विशेष आवश्यकता होती है। यदि किसी वृद्ध की पर्याप्त देखभाल और सहानुभूति नहीं मिलती तो उसकी असमय मृत्यु भी हो जाती है। वे बच्चों की तरह जिद करते हैं, उनमें चिड़चिड़ापन आ जाता है इस कारण वे कई बार परिवार में उनका सामन्जस्य नहीं हो पाता है।

इस तरह यह दोनों अवस्थाएँ बाल विकास की दृष्टि से उतना महत्व न रखते हुए भी जीवन में अपना महत्व रखती हैं। व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए प्रत्येक अवस्था का ज्ञान होना आवश्यक है, जिसमें प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था भी शामिल हैं। प्रौढ़ावस्था की क्रियाशीलता एवं जवाबदेही की जानकारी तो होना ही चाहिए, वृद्धावस्था में बुजुर्गों की स्थिति की जानकारी होनी चाहिए जिससे कि उनकी उचित देखभाल हो सके।

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