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पूर्व मध्यकाल का गुर्जर प्रतिहार वंश | The Gurjara Pratihara dynasty of the early medieval period

गुर्जर प्रतिहार वंश के महत्वपूर्ण शासक नागभट्ट प्रथम, वत्सराज, मिहिरभोज प्रथम, महेंद्रपाल प्रथम और महिपाल प्रथम हैं।

The important rulers of this dynasty are Nagabhatta I, Vatsaraja, Mihirbhoj I, Mahendrapala I and Mahipala I.

गुर्जर प्रतिहार वंश के शासकों ने भारतवर्ष के गुजरात और दक्षिण-पश्चिम राजस्थान में शासन किया था। उनके शासनकाल के विभिन्न अभिलेख एवं अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। इन अभिलेखों के अनुसार प्रतिहार शासक भगवान श्री राम के छोटे भाई लक्ष्मण के वंशज थे। 'गुर्जर जाति' का उल्लेख सर्वप्रथम ऐहोल अभिलेख में प्राप्त हुआ है। यह पुलकेशिन द्वितीय का अभिलेख है। गुर्जर प्रतिहार वंश का संस्थापक हरिश्चंद्र था। इस वंश का प्रथम महत्वपूर्ण शासक नागभट्ट प्रथम था। प्रतिहार शासकों ने उत्तर भारत के विस्तृत क्षेत्र में शासन किया था। इनका राज्य पश्चिमी राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और गंगा यमुना दोआब के क्षेत्रों में विस्तृत था।

The rulers of the Gurjara Pratihara dynasty ruled in Gujarat and south-west Rajasthan in India. Various records and other important evidences of his reign have been received. According to these inscriptions, the Pratihara rulers were descendants of Lakshmana, the younger brother of Lord Rama. 'Gurjar caste' is first mentioned in the Aihole inscription. This is the inscription of Pulakeshin II. The founder of Gurjara Pratihara dynasty was Harishchandra. The first important ruler of this dynasty was Nagabhatta I. The Pratihara rulers ruled over a vast area of ​​northern India. Their kingdom extended over the areas of western Rajasthan, Haryana, Punjab and the Ganges Yamuna Doab.

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गुर्जर प्रतिहार वंश के महत्वपूर्ण शासक निम्नलिखित हैं–
1. नागभट्ट प्रथम
2. वत्सराज
3. नागभट्ट द्वितीय
4. मिहिरभोज प्रथम
5. महेंद्रपाल प्रथम
6. महिपाल प्रथम

The following are the important rulers of Gurjara Pratihara dynasty–
1. Nagabhatta I
2. Vatsaraj
3. Nagabhatta II
4. Mihirbhoj I
5. Mahendrapal I
6. Mahipal I

नागभट्ट प्रथम (Nagabhatta I)

नागभट्ट प्रथम ने 730 ईस्वी से 756 ईस्वी तक शासन किया। उसने अरब के शासकों को युद्ध में पराजित किया था। फलस्वरुप भारत के पश्चिमी हिस्से में प्रतिहार शासकों के शक्तिशाली राज्य की स्थापना हुई। ग्वालियर प्रशस्ति में नागभट्ट की प्रशंसा कर उसे 'म्लेच्छों (अरबों) का नाशक' कहा गया है।

Nagabhatta I ruled from 730 AD to 756 AD. He defeated the rulers of Arabia in battle. As a result, a powerful kingdom of Pratihara rulers was established in the western part of India. In the Gwalior Prashasti, Nagabhatta has been praised as 'Destroyer of the Mlechchas (Arabs)'.

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वत्सराज (Vatsaraj)

वत्सराज एक महान शासक था। उसने 775 ईस्वी से 880 ईस्वी तक शासन किया। उसे प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है। अपने शासनकाल के दौरान उसने पाल वंश के शासक धर्मपाल को युद्ध में पराजित किया था। उसने 'त्रिपक्षीय संघर्ष' में भाग लिया था। दुर्भाग्यवश उससे राष्ट्रकूट शासक ध्रुव से युद्ध में पराजित होना पड़ा।

Vatsaraja was a great ruler. He ruled from 775 AD to 880 AD. He is said to be the real founder of the Pratihara Empire. During his reign, he defeated Dharmapala, the ruler of the Pala dynasty, in a battle. He participated in 'Tripartite Struggle'. Unfortunately he had to be defeated in a battle with the Rashtrakuta ruler Dhruva.

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नागभट्ट द्वितीय (Nagabhatta II)

वत्सराज की मृत्यु हो जाने के पश्चात् उसका पुत्र नागभट्ट द्वितीय सिंहासन पर विराजमान हुआ। उसने लगभग 800 ईस्वी से 833 ईस्वी तक शासन किया। उसने कन्नौज के शासक को युद्ध में पराजित कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया था। आगे चलकर उसने कन्नौज को अपनी राजधानी बना लिया।

After the death of Vatsaraj, his son Nagabhatta II ascended the throne. He ruled from about 800 AD to 833 AD. He conquered Kanauj by defeating the ruler of Kanauj in the war. Later he made Kannauj his capital.

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मिहिरभोज प्रथम (Mihirbhoj I)

मिहिरभोज एक शक्तिशाली शासक थे। उन्होंने 836 ईस्वी से 885 ईस्वी तक शासन किया। मिहिरभोज के शासनकाल के बहुत से लिखित विवरण प्राप्त हुए हैं। राजतरंगिणी के रचयिता कल्हण और अरब यात्री सुलेमान के विवरणों से भी मिहिरभोज के शासनकाल की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। मिहिरभोज के शासनकाल के दौरान भारतवर्ष में दो शक्तिशाली शासक पाल नरेश देवपाल और राष्ट्रपति नरेश ध्रुव भी अपने राज्यों में शासन कर रहे थे। मिहिरभोज को भारतीय इतिहास की इन दोनों प्रमुख शक्तियों से युद्ध में पराजित होना पड़ा। मिहिरभोज की राजधानी कन्नौज थी। वे भगवान विष्णु का अनन्य भक्त थे। उन्होंने भगवान के नाम पर 'आदिवराह' एवं 'प्रभास' जैसी उपाधियाँ धारण की। मिहिरभोज के शासनकाल की जानकारी हमें 'ग्वालियर प्रशस्ति अभिलेख' से भी प्राप्त हो सकती है।

Mihirbhoja was a powerful ruler. He ruled from 836 AD to 885 AD. Many written accounts of Mihirbhoja's reign have been received. Information about the reign of Mihirbhoja can also be obtained from the descriptions of Kalhana, the author of Rajatarangini, and the Arab traveler Suleiman. During the reign of Mihirbhoj, two powerful rulers in India, Pal Naresh Devpal and President Naresh Dhruva were also ruling in their states. Mihirbhoj had to be defeated in a battle with both these major powers of Indian history. The capital of Mihirbhoj was Kannauj. He was an exclusive devotee of Lord Vishnu. He assumed titles like 'Adivaraha' and 'Prabhas' in the name of the Lord. We can also get information about the reign of Mihirbhoj from 'Gwalior Prashasti Inscription'.

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महेंद्रपाल प्रथम (Mahendrapal I)

मिहिरभोज की मृत्यु हो जाने के पश्चात् उनके पुत्र महेंद्रपाल प्रथम सिंहासन पर विराजमान हुए। महेंद्रपाल ने 850 ईस्वी से 910 ईस्वी तक शासन किया। अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने राष्ट्रकूट शासक इंद्र तृतीय को युद्ध में पराजित किया। दुर्भाग्यवश उन्हें कश्मीर के शासकों के कारण पराजय का सामना भी करना पड़ा। महेंद्र साहित्य एवं रचनाओं को विशेष महत्व देते थे। उनकी राजसभा में प्रसिद्ध विद्वान राजशेखर रहते थे। वे महेंद्र के राजगुरु थे। उन्होंने काव्य मीमांसा, कर्पूर मंजरी, विद्वशालभंजिका, भुवनकोश, बालरामायण और हरविलास जैसे सुप्रसिद्ध जैन ग्रंथों की रचना की।

After the death of Mihirbhoj, his son Mahendrapala I sat on the throne. Mahendrapala ruled from 850 AD to 910 AD. During his reign he defeated the Rashtrakuta ruler Indra III in a battle. Unfortunately they also had to face defeat due to the rulers of Kashmir. Mahendra used to give special importance to literature and compositions. The famous scholar Rajashekhar lived in his court. He was the Rajguru of Mahendra. He composed well-known Jain texts like Kavya Mimamsa, Karpoor Manjari, Vidyasalabhanjika, Bhuvankosh, Balaramayana and Harvilas.

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महिपाल प्रथम (Mahipal I)

महिपाल एक महान और प्रतापी शासक थे। उन्होंने 912 ईस्वी से 944 ईस्वी तक शासन किया। उनके शासनकाल के दौरान बगदाद का निवासी अल-मसूदी 915 ईस्वी से 916 ईस्वी तक लगभग एक वर्ष के लिए भारतवर्ष के गुजरात आया था। अल-मसूदी गुर्जर प्रतिहार को 'अल-गुर्जर' तथा राजा को 'बौरा' कहकर संबोधित करता था। यह शब्द संभवतः आदिवराह का अशुद्ध उच्चारण था। महिपाल के शासनकाल के दौरान राज्य में सुख-शांति और समृद्धि थी। महिपाल ने भी विद्वान राजशेखर को संरक्षण प्रदान किया। राजशेखर ने महिपाल को 'आर्यावर्त्त का महाराजाधिराज' नामक उपाधि दी।

Mahipal was a great and majestic ruler. He ruled from 912 AD to 944 AD. During his reign, al-Masudi, a resident of Baghdad, came to Gujarat in India for about a year from 915 AD to 916 AD. Al-Masudi addressed the Gurjar Pratihara as 'Al-Gurjar' and the king as 'Bura'. The word was probably a misspelling of Adivaraha. During the reign of Mahipala there was happiness, peace and prosperity in the state. Mahipala also patronized the scholar Rajasekhar. Rajashekhar gave Mahipala the title 'Maharajadhiraj of Aryavarta'.

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महिपाल की मृत्यु होने के पश्चात् महेंद्रपाल द्वितीय, देवपाल, विनायक पाल द्वितीय, महिपाल द्वितीय और विजयपाल जैसे शासकों ने शासन किया। ये सभी कमजोर शासक थे। उनके शासनकाल में प्रतिहार साम्राज्य पतन की ओर तेजी से अग्रसर हो रहा था। 963 ईस्वी के दौरान राष्ट्रकूट शासक कृष्ण तृतीय ने प्रतिहार शासक को युद्ध में पराजित किया। आगे चलकर 1018 ईस्वी के दौरान महमूद गज़नवी ने प्रतिहार वंश के कमजोर शासक राज्यपाल को युद्ध में पराजित किया। इसके बाद राज्यपाल के पुत्र त्रिलोचनपाल को भी 1019 ईस्वी के दौरान महमूद गज़नवी से युद्ध में पराजित होना पड़ा। इस वंश का अंतिम शासक यशपाल था। गहड़वालों ने प्रतिहार शासक को युद्ध में पराजित कर दिया और कन्नौज पर अधिकार कर लिया। परिणाम स्वरूप गुर्जर प्रतिहार वंश का पतन हो गया।

After the death of Mahipala, rulers like Mahendrapala II, Devapala, Vinayaka Pal II, Mahipala II and Vijayapala ruled. All these were weak rulers. During his reign, the Pratihara Empire was rapidly progressing towards its decline. During 963 AD Rashtrakuta ruler Krishna III defeated the Pratihara ruler in a battle. Later, during 1018 AD, Mahmud Ghaznavi defeated the weak ruler Governor of Pratihara dynasty in a battle. After this, Trilochanpal, the son of the governor, also had to be defeated in a battle with Mahmud Ghaznavi during 1019 AD. Yashpal was the last ruler of this dynasty. The Gahadavalas defeated the Pratihara ruler in the battle and took control of Kanauj. As a result the Gurjara Pratihara dynasty declined.

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आशा है, उपरोक्त जानकारी आपके लिए उपयोगी होगी।
धन्यवाद।
R F Temre
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(आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।)
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R F Temre
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