Blog / Content Details

विषयवस्तु विवरण

अधिगम क्या है? || अधिगम की परिभाषाएँ एवं विशेषताएँ || What is Learning - Definitions and  Characteristics


अधिगम क्या है? || अधिगम की परिभाषाएँ एवं विशेषताएँ || What is Learning - Definitions and Characteristics

अधिगम क्या है? विद्वानों के द्वारा दी गई अधिगम की परिभाषाएँ। अधिगम की कौन-कौन सी विशेषताएँ हैं पढ़ें।

अधिगम (Learning)

सामान्य अर्थों में किसी नवीन बात को सीखना अधिगम कहलाता है अर्थात सीखना ही अधिगम है। जन्म लेने के पश्चात् व्यक्ति अपने को एक विशेष प्रकार के भौतिक तथा सामाजिक वातावरण में घिरा पाता है, व्यक्ति की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ती इस भौतिक और सामाजिक वातावरण के अन्दर ही होती है। किंतु इन आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए व्यक्ति को कुछ न कुछ अपने वातावरण में संघर्ष या अनुकूलन करना पड़ता है। इस प्रकार के अनुकूलन के लिए वह अपनी आयु के अनुसार प्राप्त अनुभवों के आधार पर परिवर्तन लाता है। यह परिवर्तन लाना ही एक प्रकार का सीखना या अधिगम है और यही विकास भी है।
अधिगम क्या है, इस सम्बंध में जानकारी प्राप्त करने हेतु विभिन्न विद्वानों के मतों (परिभाषाओं) के बारे में जानना अति आवश्यक है।

इन 👇 प्रकरणों के बारे में भी जानें।
1. बाल विकास क्या है इसकी अवधारणा एवं परिभाषाएंँ
2. बाल विकास की विशेषताएंँ
3. विकास के अध्ययन की उपयोगिता- बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र
4. बाल विकास के अध्ययन में ध्यान रखे जाने वाली प्रमुख बातें
5. गर्भावस्था एवं माता की देखभाल
6. शैशवावस्था- स्वरूप, महत्वव विशेषताएँ

अधिगम की परिभाषाएँ

(1) गेट्स के अनुसार- "अनुभव और प्रशिक्षण द्वारा अपने व्यवहारों का संशोधन और परिमार्जन करना ही सीखना है।"

(2) गिलफोर्ड के अनुसार- "व्यवहार के कारण व्यवहार में परिवर्तन ही सीखना है।"

(3) स्किनर के अनुसार- "सीखना व्यवहार में प्रगतिशील सामन्जस्य की प्रक्रिया है।"

(4) क्रो एण्ड क्रो के अनुसार - "सीखना आदतों, ज्ञान और अभिवृत्तियों का अर्जन है।"

(5) क्रानवेक के अनुसार- "सीखना, अनुभव के फल स्वरूप व्यवहार में परिमार्जन द्वारा अभिव्यक्त होता है।"

(6) वुडवर्थ के अनुसार - "नवीन ज्ञान और प्रक्रियाओंको प्राप्त करने की प्रक्रिया सीखने की प्रक्रिया है।"

(7) कौलविन के अनुसार- "अनुभव के आधार पर हमारे पूर्व निर्मित व्यवहार में परिवर्तन की प्रक्रिया ही सीखना है।"

(8) डगलस और हालैण्ड के अनुसार - "सीखना वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति नवीन प्रकार के व्यवहारों में परिवर्तन करता है नवीन व्यवहार को अपनाता है।

(9) ई.ए. पील के अनुसार- "सीखना व्यक्ति में एक परिवर्तन है जो उसके वातावरण के परिवर्तनों के अनुसरण में होता है।

(10) प्रेसी के मतानुसार- "सीखना उस अनुभव को कहते हैं जिसके द्वारा व्यवहार में परिवर्तन या समायोजन होता है और जिससे व्यवहार की नई दिशाएँ प्राप्त होती हैं।"

इन 👇 प्रकरणों के बारे में भी जानें।
1. विकास के स्वरूप
2. वृद्धि और विकास में अंतर
3. बाल विकास या मानव विकास की अवस्थाएँ
4. बाल्यावस्था स्वरूप और विशेषताएँ
5. किशोरावस्था- किशोरावस्था की विशेषताएँ

अधिगम की विशेषताएंँ

उक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने के पश्चात अधिगम की निम्नलिखित विशेषताएँ निर्धारित की जा सकती हैं।

(1) सीखना परिवर्तन है - सीखना एक प्रकार का परिवर्तन करना ही है। क्योंकि व्यक्ति के द्वारा किसी नवीन ज्ञान को प्राप्त कर उसे व्यवहार में लाया जाता है तो निश्चित ही बालक या व्यक्ति के जीवन में कुछ परिवर्तन आते हैं इसलिए कहते हैं सीखना परिवर्तन है।

(2) सीखना जीवन भर चलता है - अधिगम व्यक्ति के जन्म के पश्चात से प्रारंभ होकर मरते तक चलते रहता है। ऐसा कोई भी पल व्यक्ति के जीवन में नहीं होता जहाँ वह कुछ न कुछ अनुभव करते हुए सीखता न हो। अतः सीखना व्यक्ति के पूरे जीवन काल में चलते रहता है।

(3) सीखना विकास है - जब बालक के द्वारा कोई बात है सीख ली जाती है और उसे अपने व्यवहार में लाया जाता है तब बालक के व्यवहारिक एवं मानसिक क्षेत्र में उन्नति होती है। इस तरह से कहा जा सकता है कि सीखना विकास करना है।

(4) सीखना सार्वभौमिक प्रक्रिया है - सार्वभौमिक का अर्थ होता है सर्वत्र। अधिगम (सीखना) को सार्वभौमिक प्रक्रिया इसलिए माना जाता है क्योंकि अधिगम प्रक्रिया समस्त प्राणियों में होती है। ऐसा कोई प्राणी नहीं है जिसमें अधिगम न होता हो। इसलिए यह एक सार्वभौमिक प्रक्रिया कहलाती है।

(5) सीखना उद्देश्यपूर्ण होता है - अधिगम की यह एक महत्वपूर्ण विशेषता है। किसी भी प्राणी के द्वारा अधिगम करना एक उद्देश्य को लेकर होता है। यदि हम अपने विद्यार्थियों को किसी अवधारणा का ज्ञान दे रहे हैं या उसे कोई बात सिखा रहे हैं तो उसके पीछे हमारा कोई न कोई उद्देश्य होता है। उदाहरण के लिए एक बालक को कंप्यूटर चलाना सिखाया जाता है तो इसका उद्देश्य है कि वह कई तरह की जानकारियाँ कंप्यूटर से प्राप्त कर सके। अतः यहाँ कंप्यूटर के बारे में सीखने का उद्देश्य कंप्यूटर से अन्य जानकारी प्राप्त करना हुआ।

(6) सीखना समायोजन करना है - एक व्यक्ति या बालक जिस परिवेश में रहता है उसे उस माहौल में ढलने के लिए आवश्यक जानकारियों को प्राप्त करने की आवश्यकता होती है। यदि व्यक्ति आवश्यक बातों को सीख लेता है तो फिर अपने परिवेश में सहज अनुकूलित हो जाता है अर्थात अपने आप को समायोजित कर लेता है। इस तरह से सीखना समायोजन करना होता है।

इन 👇 प्रकरणों के बारे में भी जानें।
1. बहुभाषिकता क्या है
2. संप्रेषण क्या है
3. शिक्षा मनोविज्ञान- प्रकृति और उद्देश्य
4. समाजीकरण का अर्थ
5. POCSO act क्या है

(7) सीखना अनुभवों का संगठन है - सीखना अनुभवों का संगठन इसलिए है क्योंकि बालक सतत रूप से अधिगम करता है और कई तरह की बातों को सीखते रहता है जो उसे उन्नति की राह पर ले जाते हैं। इस तरह बालक के पास ढेर सारी जानकारियों उसके अनुभवों का संगठन होता है जिनके आधार पर वह अपने व्यवहार को परिपक्व और परिमार्जित करता है।

(8) सीखने में सक्रियता आवश्यक है - अधिगम हेतु सक्रियता बहुत आवश्यक होती है। यदि किसी बालक को किसी ज्ञान को प्राप्त करना है या कोई जानकारी हासिल करना चाहता है तो उसे पूर्णतः सजग और सक्रिय रहना होगा। निष्क्रियता की स्थिति में अधिगम संभव नहीं होता है। इसीलिए कक्षा में शिक्षक के द्वारा बच्चों को विभिन्न प्रकार के खेलों, गतिविधियों के माध्यम से सक्रिय रखा जाता है ताकि वे सहज अधिगम कर सकें।

(9) सीखना खोज करना है - सीखना एक प्रकार की खोज है। इस संबंध में (Mursell) मरसेल कहते हैं- "सीखना उस तथ्य को खोजने और जानने का कार्य है, जिसे व्यक्ति खोजना और जानना चाहता है।"
सामान्य सी बात है यदि बालक या व्यक्ति किसी जानकारी को प्राप्त करना चाहता है तो उसे विभिन्न क्षेत्रों में अग्रसर होना होगा अर्थात खोज करने पर ही वह उस जानकारी को प्राप्त कर पाएगा। इस तरह से कर सकते हैं सीखना खोज करना है।

(10) सीखना नवीन वातावरण की उत्पत्ति है - सीखना नवीन वातावरण की उत्पत्ति है। इस बात को इस तरह से समझ सकते हैं- जैसे एक बालक कोई नवीन ज्ञान को प्राप्त करता है तो वह उसके अनुसार अपने परिवेश में एक बदलाव करता है या स्वयं में परिवर्तन करता है अर्थात एक नए तरह का वातावरण तैयार हो जाता है। निश्चित ही प्राणी के द्वारा नवीन ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात परिवर्तन होना स्वाभाविक है। इस तरह से हम कर सकते हैं सीखना नवीन वातावरण की उत्पत्ति है।

(11) सीखना व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों प्रकार से होता है - बालक स्वयं अपने विकास या उन्नति के लिए अधिगम तो करता ही है साथ ही उसे ऐसे व्यवहारों को भी सीखना होता है जो समाज के लिए हितकर हैं। बालक अपनी व्यक्तिगत रुचि एवं कार्य कुशलता के अनुसार कई तरह के व्यवहारों को सीख लेता है। साथ ही उसे सार्वजनिक मान्यताओं से युक्त व्यवहारों को भी सीखना होता है इस तरह से सीखना व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों तरह से होता है।

(12) सीखना अनुकूलन करना है - जन्म के पश्चात बालक परिवार में समायोजित होते हुए आयु बढ़ने के साथ-साथ उसका सामाजीकरण होता है। समायोजन अर्थात अनुकूलन तभी संभव है जब बालक आवश्यक बातों अर्थात व्यवहारों को सीख ले। बिना आवश्यक व्यवहार के कहीं पर भी व्यक्ति का अनुकूलन संभव नहीं है। यदि व्यक्ति किसी परिवेश में अनुकूलित होता है अर्थात भली प्रकार अपने व्यवहारों को प्रदर्शित करता है तो इसका आशय यह है कि उसने उस परिवेश से संबंधित आवश्यक बातों को सीख लिया है। इस तरह से हम कह सकते हैं सीखना अनुकूलन करना है।

(13) सीखना यांत्रिक कार्य न होकर विवेकपूर्ण कार्य है - अधिगम प्रक्रिया यांत्रिक नहीं होती है। व्यक्ति के द्वारा किस व्यवहार को सीखना है, किस व्यवहार को नहीं सीखना है यह विवेक के ऊपर निर्भर करता है। किसी यंत्र में किसी कार्य-विधि को स्थापित किया जाता है तो वह उसी अनुसार कार्य करता है। इसके अलावा अलग से कोई भी कार्य नहीं होता है। किंतु व्यक्ति के द्वारा अधिगम प्रक्रिया सोच समझकर होती है। अपने विवेक के अनुसार व्यक्ति अपने अनुकूल व्यवहार को ही सीखता है। इस तरह हम कह सकते हैं सीखना यांत्रिक न होकर विवेक पूर्ण होता है।

इन 👇 प्रकरणों के बारे में भी जानें।
1. उद्योतन सामग्री क्या होती है
2. किशोरावस्था का स्वरूप
3. प्रौढ़ावस्था एवं वृद्धावस्था काल


संबंधित जानकारी के लिए नीचे दिये गए विडियो को देखें।👇🏻
(Watch video for related information)

आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।
(I hope the above information will be useful and important. )
Thank you.
लेखक
(Writer)
infosrf.com

अन्य ब्लॉग सर्च करें

पाठकों की टिप्पणियाॅं (0)

अभी तक किसी पाठक ने कमेंट नहीं किया है, आप अपनी पहली टिप्पणी देने वाले बनें।

अन्य महत्वपूर्ण जानकारी से संबंधित लिंक्स👇🏻

https://youtu.be/ari19Bs25-U

You may also like

शिक्षक शिकायत निवारण तंत्र, विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात (PTR), एवं पाठ्यचर्या व मूल्यांकन प्रक्रिया – (मध्यप्रदेश RTE नियम 2011 : नियम 16, 17, 18)

शिक्षक शिकायत निवारण तंत्र, विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात (PTR), एवं पाठ्यचर्या व मूल्यांकन प्रक्रिया – (मध्यप्रदेश RTE नियम 2011 : नियम 16, 17, 18)

शिक्षक शिकायत निवारण का त्रि-स्तरीय तंत्र (SMC → नियंत्रक अधिकारी → जिला समिति), जिला स्तरीय समिति में कलेक्टर (अध्यक्ष) एवं जिला शिक्षा अधिकारी (संयोजक), तिमाही बैठक, शासकीय शिक्षा पोर्टल के माध्यम से शिकायत, स्वतः संज्ञान का प्रावधान, विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात हेतु 6 माह में युक्तियुक्तकरण, रिक्त पदों की भर्ती, शासकीय शिक्षा पोर्टल पर सूचना का प्रकाशन, एवं SCERT को शैक्षणिक प्राधिकारी नियुक्त कर पाठ्यचर्या, मूल्यांकन एवं समग्र गुणवत्ता निर्धारण की प्रक्रिया

Read more
विकास योजना (SDP), शिक्षकों का वेतन एवं सेवा शर्तें, तथा शिक्षकों के कर्तव्य  (मध्यप्रदेश RTE नियम 2011 : स्कूल नियम 13, 14, 15)

विकास योजना (SDP), शिक्षकों का वेतन एवं सेवा शर्तें, तथा शिक्षकों के कर्तव्य (मध्यप्रदेश RTE नियम 2011 : स्कूल नियम 13, 14, 15)

तीन वर्षीय स्कूल विकास योजना (SDP) का प्रावधान, कक्षा-वार नामांकन, अतिरिक्त शिक्षक, अवसंरचना एवं वित्तीय आवश्यकता का आकलन, सरकारी/स्थानीय निकाय/निजी स्कूलों के शिक्षकों के लिए भिन्न वेतन एवं सेवा शर्तें, राज्य सरकार द्वारा निदेश जारी करने की शक्ति, एवं शिक्षकों के कर्तव्य – प्रत्येक बच्चे का संचयी अभिलेख, साप्ताहिक 45 घंटे कार्य, प्रशिक्षण एवं पाठ्यचर्या निर्माण में भागीदारी

Read more
प्रवेश की विस्तारित अवधि, स्कूल मान्यता प्रक्रिया, एवं स्कूल प्रबंधन समिति (SMC) – (मध्यप्रदेश RTE नियम 2011 : नियम 10, 11, 12) | परीक्षापयोगी वैकल्पिक प्रश्न

प्रवेश की विस्तारित अवधि, स्कूल मान्यता प्रक्रिया, एवं स्कूल प्रबंधन समिति (SMC) – (मध्यप्रदेश RTE नियम 2011 : नियम 10, 11, 12) | परीक्षापयोगी वैकल्पिक प्रश्न

प्रवेश हेतु 3 माह की विस्तारित अवधि, विशेष प्रशिक्षण का प्रावधान, मान्यता हेतु प्ररूप-1 में आवेदन, 45 दिन में 3 वर्षीय मान्यता प्रमाणपत्र (प्ररूप-2), अनंतिम मान्यता (प्ररूप-3), मान्यता वापसी की प्रक्रिया, तथा प्राथमिक (18 सदस्य) एवं मिडिल (16 सदस्य) स्कूलों में SMC का गठन, 3/4 अभिभावकों की भागीदारी, एवं मासिक बैठक

Read more

Search Option

Follow us

Recent post