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विषयवस्तु विवरण



पाठ 5 'व्याकरण परिवार' कक्षा 6 हिन्दी प्रमुख गद्यांशों की संदर्भ व प्रसंग सहित व्याख्या, प्रश्नोत्तर व व्याकरण

पाठ का केन्द्रीय भाव—

इस एकांकी में एकांकीकार ने व्याकरण की बातों को बड़े ही सहज ढंग से प्रस्तुत किया है। हिन्दी व्याकरण में संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया विकारी शब्द हैं और क्रिया विशेषण, सम्बन्धबोधक, समुच्चयबोधक और विस्मयादिबोधक अविकारी शब्द हैं। एकांकीकार ने विभिन्न शब्द-रूपों को एकांकी के पात्र बनाकर प्रस्तुत किया है। बच्चे स्वयं पात्र बनकर अभिनय और संवादों के द्वारा व्याकरण की कठिन अवधारणाओं को सरल व रोचक ढंग से समझ सकते हैं। इस रूप में बालक अपने परिवेश और अनुभव से लाभ उठाकर स्थायी समझ विकसित कर सकते हैं। यह एकांकी गतिविधि आधारित शिक्षा देने के सिद्धांत का अभिनव प्रयोग है।
डॉ. प्रेम भारती

संपूर्ण पाठ परिचय

समय— प्रातः काल
स्थान—हिन्दी भाषा के घर का बाहरी कक्ष
रंगमंच सज्जा— एक मेज के आसपास अर्द्ध गोलाकार रूप में कुछ कुर्सियाँ रखी हैं, मेज पर लिखने-पढ़ने के सामान के अतिरिक्त कुछ पुस्तकें भी रखी हैं।

नेपथ्य से आवाज : अपने देश भारत में एक ऐसा परिवार भी है जिसकी पहुँच हर घर में है। इस परिवार के मुखिया का नाम है श्रीमान् संज्ञानन्द महोदय तथा इस परिवार की मालकिन का - नाम है—श्रीमती क्रिया देवी इस दम्पति के तीन बच्चे हैं। एक पुत्र, दो पुत्रियाँ पुत्र का नाम 'सर्वनाम'है,और बेटियों के नाम हैं विशेषण तथा क्रियाविशेषण इस परिवार में दो नौकर भी हैं जिनके नाम हैं-सम्बन्धबोधक तथा समुच्चयबोधक इस परिवार के एक और सदस्य हैं,श्री विस्मयादिबोधक महोदय,जो इस परिवार के मित्र हैं और सुख-दुःख में सदा उनका साथ देते हैं।

आइए, इस परिवार से आपकी दिलचस्प भेंट करवाते हैं।
(संज्ञानन्द का प्रवेश। संज्ञानन्द के हाथ में एक पत्रिका है जिसके पन्नों को पलटते हुए,किसी एक पृष्ठ पर उनकी दृष्टि टिक जाती है और पढ़ने का अभिनय करते हैं।)

संज्ञानन्द : क्रिया! ओ क्रिया! कहाँ हो तुम, तुम्हारे बिना मेरा कोई भी काम नहीं होता। मेरा खाना, पीना, पढ़ना, लिखना, जाना, आना तुम्हारे बिना सम्भव नहीं है।

(श्रीमती क्रियादेवी का प्रवेश)
क्रिया देवी : मैं जानती हूँ, तुम मेरे बिना एक पल भी नहीं रह सकते, चाहे भूतकाल हो या भविष्यकाल, मैं हर समय तुम्हारे साथ रही हूँ और रहूँगी, लेकिन वर्तमान काल में भी तुम मेरे बिना नहीं रह सकते, ऐसा क्यों?
संज्ञानन्द : देखो! यहाँ टेलीविजन पर रंगमंचीय कार्यक्रम चल रहा है। मैं अकेले इस कार्यक्रम को देखूँ, यह ठीक नहीं, तुम्हें भी मेरा साथ देना होगा। और हाँ, वर्तमान में तुम साथ नहीं रहोगी तो फिर भूतकाल और भविष्यकाल कैसा?

क्रियादेवी : टेलीविजन पर कार्यक्रम क्यों देख रहे हैं आप? जानते नहीं, टेलीविजन जिस भाषा का प्रयोग कर रहा है, उससे हम अपनी परम्पराओं को भूलते जा रहे हैं। अपनी भाषा को बिगाड़कर विदेशी भाषा के शब्दों की मिलावट से हम अपनी संस्कृति पर गहरा आघात कर रहे हैं।

(विस्मयादिबोधक प्रवेश करते हैं। संज्ञानन्द तथा क्रियादेवी खड़े होकर उनका अभिवादन करते हैं।)
संज्ञानन्द: आइए भाई साहब! (कुर्सी की ओर इशारा करते हुए) बैठिए।
(तीनों कुर्सी पर बैठ जाते हैं ।)
विस्मयादिबोधक : अरे! नौ बज गए! संज्ञानन्द जी, आपके हाथ में यह कौन-सी पत्रिका है? आखिर इसमें ऐसा क्या लिखा है जिसे पढ़कर आप लोग हँस रहे हैं। आज बच्चे नहीं दिखाई दे रहे ! कहाँ है भाई सब लोग? ये सन्नाटा क्यों पसरा हुआ है?
(तभी सर्वनाम, विशेषण तथा क्रियाविशेषण सब एक-एक कर आते हैं और एक साथ सभी को प्रणाम करते हैं।)

विस्मयादिबोधक : नमस्ते बेटा सर्वनाम ! कहाँ थे तुम? क्या कर रहे थे अभी तक?बताओ तो।
सर्वनाम : मैं परिवार में सबसे बड़ा हूँ न। घर का सारा काम मुझे ही करना पड़ता है। सो वही कर रहा था।
विस्मयादिबोधक : और हमारी दोनों बेटियाँ क्या कर रही थीं?

विशेषण : मैं सर्वनाम की बहन हूँ।मेरे पिता जी और बड़े भाई सर्वनाम दोनों ही मुझे बहुत चाहते हैं। दोनों की क्या तारीफ़ करूँ ! इनमें इतने गुण और योग्यताएँ हैं कि उनको बताते-बताते मेरे पास शब्द कम पड़ जाते हैं।
विस्मयादिबोधक : और बेटी क्रियाविशेषण, तुम क्या कर रही थी?
क्रियाविशेषण : मैं अपनी माँ को बहुत चाहती हूँ। मैं तो अपनी माँ की इतनी प्रशंसा करती हूँ कि भैया और पिता जी को भी भूल जाती हूँ।बस,उन्हीं के काम में हाथ बँटा रही थी।

विस्मयादिबोधक : तुम माँ के सामने पिताजी और भाई को भी भूल जाती हो, ऐसा क्यों बेटी!
क्रियाविशेषण : ये लोग मुझे नहीं चाहते इसलिए इनकी प्रशंसा क्यों करूँ?तारीफ तो क्रिया की होनी चाहिए। काम किस तरह किया जाए,क्या किया जाए,किस समय किया जाए, यह बात ही मैं माँ को बताती रहती हूँ। और सुनो, माँ के सभी कर्म सकर्मक थोड़े ही होते हैं - कभी हँसती है, कभी रोती है,कभी गप्पें लड़ाती है, यह भी कोई काम हुए : ये सभी अकर्मक है।

विस्मयादिबोधक : बस! बस ! ठीक है। सुनो भाई संज्ञानन्द ! आज तुम्हारे घर इसलिए आया हूँ कि लगता है, तुम्हारा परिवार पर नियंत्रण नहीं रहा । सर्वनाम, विशेषण, क्रियाविशेषण घर के कामों में इतने लगे रहते हैं कि समाज में इनकी पहचान लुप्त होती जा रही है। अभी-अभी मैं रास्ते में आ रहा था तो एक लड़की को यह कहते हुए सुना― "मैं भी चलूँगा, तुम अकेले नहीं।जा सकते।" क्या उसका यह कहना ठीक है? पुरुष, पुरुष की तरह बोलता है; स्त्री, स्त्री की तरह। श्रीमान् संज्ञानन्द महोदय ! आगे की क्या कहूँ? लोग अपनी भाषा में तुम्हें भी भूलते जा रहे हैं। आज एक घर में गया, वहाँ मैंने एक छोटी-सी बच्ची से पूछा- "बेटा बताओ, 'गाय कहाँ' खड़ी है?" उसने कहा- "मुझे क्या पता?" फिर मैंने पूछा "बताओ, 'काऊ कहाँ खड़ी है?" उसने बताया- "यह रही।" बताओ, यदि यही हाल रहा तो कौन, किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान के बारे में सही-सही बता पाएगा? आज मोहन, सोहन नाम कहीं सुनाई नहीं दे रहे हैं। पिंकू, टिंकू चल पड़े हैं। मुझे तो डर है, तुम्हारा खानदान ही बरबाद होकर रहेगा। लोग भूल जाएँगे कि तुम्हारा असली खानदान क्या है?

संज्ञानन्द: कैसे भूल जाएँगे? मैं जानता हूँ। मेरा वंश संस्कृत भाषा से चला है। संस्कृत भाषा इस देश की सबसे प्राचीन भाषा है, जिसका व्यवहार ऋषि-मुनि, विद्वान, कवि सभी करते रहे हैं। इसे देवभाषा भी कहा जाता है। उसकी सन्तानें प्राकृत भाषा एवं पाली भाषा के रूप में प्राप्त होती हैं। प्राकृत भाषाओं से ही अपभ्रंश भाषा का जन्म हुआ। कहते हैं अपभ्रंश भाषा का अर्थ है—बिगड़ी हुई भाषा। यह नाम विद्वानों ने रखा था, लेकिन मैं जानता हूँ, अपभ्रंश लोक भाषा के रूप में विख्यात थी। इसी अपभ्रंश से हिन्दी का विकास हुआ है।

विस्मयादिबोधक : यह तो ठीक है श्रीमान् संज्ञानन्द जी ! आप एक ऊँचे खानदान से हैं लेकिन आपका नाम हिन्दी कैसे पड़ा? क्या कुछ बताएँगे!
संज्ञानन्द: मैं जानता हूँ, तुम क्या कहना चाहते हो?हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान : ये नाम संस्कृत के नहीं, फारसी के हैं। यही न! तो सुनो, यह बात ऐसी है कि बच्चा हमारे घर जन्मे और उसका नामकरण पड़ोसी करें। पर ऐसा नहीं है चूँकि फारसी बोलने वाले सिंधु को हिन्दू कहते थे, इसलिए इस देश की भाषा को उन्होंने हिन्दी कहकर पहचान दी।

विस्मयादिबोधक : ठीक है!ठीक है!! अरे भाई! क्या बातें ही चलती रहेंगी या कुछ खिलाओगे-पिलाओगे भी?
संज्ञानन्द : अरे! सम्बन्धबोधक, समुच्चयबोधक! कहाँ हो तुम लोग? देखो, कौन आए हैं। तुम्हें पता नहीं, अतिथि का स्वागत करना हमारा धर्म है।

संबंधबोधक : आया मालिक! मैं तो आपके और सर्वनाम भैया के बाहर जाने की तैयारी में लगा था।
विस्मयादिबोधक : और क्या क्रिया भाभी बाहर नहीं जा रही हैं? ये भी तो जा रही हैं? फिर तुम संज्ञानन्द और सर्वनाम का ही काम क्यों करते हो; इनका क्यों नहीं? (समुच्चयबोधक का प्रवेश)

समुच्चयबोधक : मैं बताऊँ महोदय, असली बात यह है कि सम्बन्धबोधक तो नौकर की तरह है। नौकर केवल मालिक की बात सुनता है और उसके बेटे की। बाकी सारे घर का काम मैं करता हूँ। घर के प्रत्येक सदस्य की देख-रेख करने की जिम्मेदारी मेरी है। मैं तो पूरे परिवार का नौकर हूँ। मैं चाहूँ तो किन्तु, परन्तु, मगर लगाते हुए यह कह सकता हूँ कि काम इस कारण नहीं हुआ। मैं बीमार हूँ, क्योंकि मुझे सर्दी लग गई हैं। लेकिन मैं ऐसा नहीं करता।
अब सुनिए, कल रविवार था। सब लोगों ने तय किया, पिकनिक मनाएँगे। मैं तैयारी में लग गया लेकिन अचानक वर्षा हो गई। वर्षा लगातार होती गई इसलिए मुझे सर्दी लग गई।

विस्मयादिबोधक : बस, बस, बस करो भाई! तुमने अपनी पहचान भी इस तरह बता दी। 'और', 'तथा', 'लेकिन', 'अथवा', 'इसलिए', 'नहीं तो', 'क्योंकि': यह सब कहना तो तुम्हारी आदत में शुमार है। भाई वाह! अरे क्रिया विशेषण और सम्बन्धबोधक! तुम दोनों के काम में अन्तर क्या है ? मुझे लगता है, जैसी तुम माँ की सेवा करती हो, वैसे ही सम्बन्धबोधक संज्ञानन्द और सर्वनाम की सेवा करता है। काम में अन्तर समझ में नहीं आता?

क्रिया विशेषण : नहीं महोदय! हम दोनों के काम में बहुत बड़ा अन्तर है। मेरा काम है - मेरी माँ (क्रिया) किसी काम को कैसे, कब, कहाँ और कितना करती है; इस बात का ध्यान रखकर सहायता करना और सम्बन्धबोधक का काम है: पिताजी और भाई के बीच सम्बन्ध जोड़ना।
जैसे- सामने मन्दिर है (यह बताना मेरा काम है)। घर के सामने मन्दिर है (यहाँ घर और मन्दिर दोनों के बीच सम्बन्ध जोड़ना सम्बन्धबोधक का काम है)।

विस्मयादिबोधक : वाह! भाई वाह! यह भी खूब रही। क्या खूब सभी ने अपना-अपना काम बताया। समय बहुत अधिक हो चला है। अब चलना चाहिए।
(सर्वनाम, विशेषण, क्रियाविशेषण, विस्मयादिबोधक के पैर छूते हैं।)

विस्मयादि बोधक : जीते रहो! दीर्घायु हो! सुनो! जाते-जाते मैं सभी को एक सलाह देता जा रहा हूँ, ध्यान रखना। “ "बेटा सर्वनाम-लिंग, वचन और कारक ये तीन, तुम्हारी शक्तियाँ हैं। इनका ध्यान रखना। मैं पढ़ता हूँ। मैं पढ़ती हूँ। हम पढ़ते हैं। मैं पुस्तक से पढ़ता हूँ। माँ कपड़े सिलती है। इन सभी वाक्यों में लिंग, वचन और कारक की समानता है, यह परम्परा खत्म नहीं होनी चाहिए।"
"बेटी विशेषण ध्यान रहे, तुम्हारा काम सुन्दर, अधिक सुन्दर, सबसे सुन्दर होना चाहिए; ऐसा न हो कि तुम्हारा काम खराब, अधिक खराब और सबसे खराब होता जाए। तुम्हें समाज के समाने आदर्श रखना चाहिए कि अपना लक्ष्य महान, महानतर और महानतम हो। एक-एक सीढ़ी चढ़कर विकास की उच्चतम अवस्था तक पहुँचना ही सबका लक्ष्य बने यह ध्यान रहे।"

शब्दार्थ


पाठ के कठिन शब्दो के अर्थ—

सभागृह = सभाकक्ष।
रंगमंच = नाटक तथा सांस्कृतिक कला प्रदर्शन का स्थल।
दिलचस्प = रोचक।
सन्नाटा = नीरवता, वह अवस्था जिसमें कहीं कुछ ध्वनि न हो।
नियंत्रण = अंकुश, रोक।
लुप्त = छिपा हुआ।
खानदान = कुल घराना।
विख्यात = प्रसिद्ध।
दीर्घायु = लम्बी आयु,अधिक आयु

परीक्षोपयोगी गद्यांशों की व्याख्या

गद्यांश (1)— टेलीविजन पर कार्यक्रम क्यों देख रहे हैं आप ? जानते नहीं, टेलीविजन जिस भाषा का प्रयोग कर रहा है, उससे हम अपनी परम्पराओं को भूलते जा रहे हैं। अपनी भाषा को बिगाड़कर विदेशी भाषा के शब्दों की मिलावट से हम अपनी संस्कृति पर गहरा आघात कर रहे हैं।

सन्दर्भ— यह गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक 'भाषा-भारती' के पाठ 'व्याकरण परिवार' से लिया गया है। इसके लेखक — डॉ. प्रेम भारती हैं।
प्रसंग― इस गद्यांश में अपनी भाषा के प्रयोग करने के लिए सलाह दी गई है।

व्याख्या― लेखक ने क्रियादेवी नामक पात्र द्वारा संज्ञानन्द नामक अपने पति से पूछा है कि वे टेलीविजन पर किसी भी कार्यक्रम को क्यों देख रहे हैं। टेलीविजन पर विदेशी भाषा में किसी भी कार्यक्रम को दिखाया जा रहा है। इस भाषा के प्रयोग के कारण हमने अपने रीति-रिवाजों को भुला दिया है इस विदेशी भाषा के शब्दों ने अपनी भाषा में मिलकर बड़ा बिगाड़ पैदा किया है। इस तरह इन शब्दों की मिलावट ने हमारी सभ्यता और हमारे आचरण को गहरी चोट पहुँचाई है। हमारे व्यक्तित्व,जाति एवं राष्ट्र सम्बन्धी आचरण और विचारों तक को प्रभावित किया है जिससे हमारी राष्ट्रीय सोच और बौद्धिक विकास में बाधा पड़ी है।

गद्यांश (2)— संस्कृत भाषा इस देश की सबसे प्राचीन भाषा है, जिसका व्यवहार ऋषि-मुनि, विद्वान, कवि सभी करते रहे हैं। इसे देवभाषा भी कहा जाता है। उसकी सन्तानें प्राकृत भाषा एवं पाली भाषा के रूप में प्राप्त होती हैं। प्राकृत भाषाओं से ही अपभ्रंश भाषा का जन्म हुआ है।

संदर्भ—पूर्व की तरह।
प्रसंग— लेखक ने संस्कृत की प्राचीनता बताई है और उससे जन्म लेने वाली भाषाओं का उल्लेख किया है।

व्याख्या— लेखक स्पष्ट करता है कि संसार की सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत है। इस भाषा का प्रयोग ऋषियों, मुनियों विद्वानों और कवियों ने किया है इसी भाषा को देवताओं की भाषा भी कहा जाता है प्राचीन काल के भारतीय समाज के लोगों का आश्रम देवताओं के समान था शंकर भाषा की दो प्रमुख संताने प्राकृत भाषा और पाली है प्राकृत भाषाओं से ही अपभ्रंश भाषा विकसित हुई है अर्थात इन सभी भाषाओं की जननी संस्कृत ही है।

अभ्यास

1 सही विकल्प चुनकर लिखिए―
(क) संज्ञानंद का काम नहीं हो सकता।
(i) विशेषण के बिना
(ii) क्रियाविशेषण के बिना
(iii) विस्मयादिबोधक के बिना
(iv) क्रियादेवी के बिना
उत्तर— (iv) क्रिया देवी के बिना

(ख) संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्दहै।—
(i) क्रिया विशेषण
(ii) विशेषण
(iii) सम्बन्धबोधक
(iv) क्रिया।
उत्तर (ii) विशेषण।

प्रश्न 2. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए—
(क) अपनी भाषा को बिगाड़कर विदेशी भाषा के शब्दों की मिलावट से हम अपनी संस्कृति पर गहरा आघात कर रहे हैं।
(ख) महान, महानतर और महानतम शब्द विशेषण की अवस्थाएँ हैं।
(ग) क्रिया विशेषण की माँ का नाम क्रिया देवी है।
(घ) संज्ञा या सर्वनाम का वाक्य में अन्य शब्दों से सम्बन्ध बताने वाले शब्द सम्बन्धबोधक कहलाते हैं।

प्रश्न3 एक या दो वाक्यों में उत्तर दीजिए—
(क) विशेषण किसे कहते हैं?
उत्तर― संज्ञा अथवा सर्वनाम शब्दों की विशेषता बताने वाले शब्दों को विशेषण कहते हैं।

(ख) सर्वनाम शब्द किन शब्दों के बदले में आते हैं?
उत्तर— संज्ञा शब्दों के बदले में सर्वनाम शब्द आते हैं।
(ग) समुच्चयबोधक वाक्य में क्या काम करता है?
उत्तर― समुच्चयबोधक वाक्य दो शब्दों या दो या दो से अधिक वाक्यों को जोड़ता है।दो या दो से अधिक वाक्यों को जोड़कर ऐसे उपवाक्यों का निर्माण होता है जो अपना स्वतंत्र अर्थ प्रकट कर सकते हैं।

प्रश्न 4. तीन से पाँच वाक्यों में उत्तर लिखिए—
(क) संज्ञानन्द और क्रियादेवी के तीन बच्चे और दो नौकर कौन-कौन से है।
उत्तर— संज्ञानन्द और क्रिया देवी के तीन बच्चे हैं-एक पुत्र और दो पुत्रियाँ पुत्र का नाम 'सर्वनाम' है। उनकी दो बेटियों के नाम हैं- विशेषण तथा क्रिया-विशेषण। उनके दो नौकर भी हैं जिनके नाम हैं—सम्बन्धबोधक तथा समुच्चयबोधक।

(ख) व्याकरण के परिवार में विशेषण का क्या महत्त्व है?
उत्तर― व्याकरण के परिवार में विशेषण का बहुत बड़ा महत्त्व है। विशेषण संज्ञा और सर्वनाम की विशेषताओं,उनके गुणों को बताने वाला शब्द है। विशेषण की तीन अवस्थाएँ होती हैं—
(1) सामान्य अवस्था। जैसे— विशाल।
(2) तुलनात्मक अवस्था। जैसे ― विशालतर।
(3) उत्तमावस्था। जैसे— विशालतम।

(ग) हिन्दी भाषा के जन्म की कहानी लिखिए।
उत्तर— हिन्दी भाषा का जन्म संस्कृत भाषा से हुआ है। संस्कृत भाषा हमारे देश की सबसे प्राचीन भाषा है। हिन्दी भाषा की के अतिरिक्त संस्कृत से ही प्राकृत और पाली भाषाओं का जन्म हुआ है। प्राकृत भाषाओं से अपभ्रंश भाषा विकसित हुई है। इसी अपभ्रंश से हिन्दी का धीरे-धीरे विकास हुआ है। हिन्दी भाषा की शब्दों से सम्बन्ध विशेषता है कि इसमें जो बोला जाता है, वही लिखा जाता है।

(घ)— क्रिया-विशेषण और सम्बन्धबोधक में क्या अन्तर है।
उत्तर—क्रिया-विशेषण— वाक्य की क्रिया की विशेषता बताता है। इसके अतिरिक्त विशेषण और स्वयं अपनी अर्थात् क्रिया-विशेषण की भी विशेषताओं का उल्लेख करती है।
सम्बन्धबोधक— किसी संज्ञा या सर्वनाम के पहले प्रयुक्त संज्ञा अथवा सर्वनाम के साथ उनके परस्पर सम्बन्ध को स्पष्ट आते हैं ? करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।

सोचिए और बताइए-

प्रश्न 5. सोचिए और बताइए―
(क) क्रिया-विशेषण, विशेषण से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर— क्रिया-विशेषण द्वारा किसी वाक्य की क्रिया, उसमें स्वतंत्र अर्थ प्रयुक्त विशेषण अथवा दूसरी क्रिया-विशेषण की विशेषता बताई जाती है। जबकि विशेषण अपने वाक्य में प्रयुक्त किसी संज्ञा या सर्वनाम की ही विशेषता स्पष्ट करता है। यही दोनों में अन्तर है।

(ख) संकट के समय यदि आपके मित्र साथ छोड़ दें तो आप क्या करेंगे?
उत्तर— संकट के समय यदि हमारा मित्र अचानक साथ छोड़ देता है, तो हमें अचम्भा या विस्मय होता है। लेकिन हम प्रयास करेंगे कि उस मित्र की सहायता या सहयोग हमको मिले। यदि किसी कारण वैसा नहीं होता है तो हमें स्वयं संकट का मुकाबला करने को तैयार रहना चाहिए। साहसपूर्वक आने वाले संकट की घड़ी में धैर्यपूर्वक अपने कर्त्तव्य का पालन करते रहना चाहिए।

(ग) विस्मयादिबोधक शब्दों से हम अपने मन के किन-किन भावों को प्रकट करते हैं?
उत्तर— विस्मयादिबोधक शब्द हमारे मन के भय, आक्रोश, कष्ट, खुशी, प्रशंसा, अचम्भा आदि भावों को प्रकट करता है।

प्रश्न 6. अनुमान और कल्पना के आधार पर उत्तर दीजिए—
(क) क्या आप समुच्चयबोधक शब्दों के अभाव में अपनी बात पूरी कर सकते हैं?
उत्तर— हम समुच्चयबोधक शब्दों के अभाव में अपनी बात पूरी कर तो सकते हैं परन्तु अनावश्यक रूप से शब्दों की आवृत्ति बढ़ने से वाक्य की संरचना का रूप बिगड़ जाएगा।

(ख) यदि भाषा में क्रिया का प्रयोग न किया जाए तो क्या होगा?
उत्तर—भाषा में क्रिया के प्रयोग के बिना बात का उद्देश्य पता नहीं चलेगा। अर्थ समझ में नहीं आने पर भाषा का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।

(ग) यदि व्याकरण में सर्वनामों का प्रयोग न होता तो भाषा पर क्या प्रभाव पड़ता?
उत्तर— सर्वनामों के प्रयोग के बिना भाषा की सुन्दरता समाप्त ही हो जाती और संज्ञाओं के प्रयोग बार-बार करने पड़ते जिससे भाषा को बोलने, पढ़ने अथवा लिखने के प्रति अरुचि बनी रहती।

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1. विज्ञान - पाठ 2 'भोजन के घटक' एटग्रेड अभ्यासिका के महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर
2. विज्ञान - पाठ 2 'सूक्ष्मजीव - मित्र एवं शत्रु' एटग्रेड अभ्यासिका के महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर
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5. एटग्रेड अभ्यास पुस्तिका | कक्षा 06 || सामाजिक विज्ञान | ग्लोब और मानचित्र

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6. तृतीयः पाठः नपुंसलिङ्गम् (संस्कृत कक्षा-6)

I hope the above information will be useful and important.
(आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।)
Thank you.
R F Temre
infosrf.com

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